पॉक्सो मामले में शिक्षक की बर्खास्तगी बरकरार रख हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका
ग्वालियर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने ग्वालियर के एक शासकीय शिक्षक की सेवा से बर्खास्तगी को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। शिक्षक पर एक नाबालिग छात्रा से छेड़छाड़ करने के आरोप थे। जस्टिस आशीष श्रोती की अदालत ने कहा- माता-पिता के बाद बच्चों के व्यक्तित्व और भविष्य को आकार देने में शिक्षकों की भूमिका सबसे अहम होती है। ऐसे में शिक्षकों से केवल उपदेश नहीं, बल्कि आचरण से उदाहरण प्रस्तुत करने की अपेक्षा की जाती है। कोई भी व्यक्ति, जिसने नैतिक आचरण के मानकों का पालन नहीं किया हो, उसे शिक्षक के रूप में कार्य करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। अदालत ने शिक्षक की बर्खास्तगी पर हस्तक्षेप करने से इंकार करके उसकी याचिका खारिज कर दी। हालांकि, न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि यदि लंबित आपराधिक अपील में याचिकाकर्ता को बरी किया जाता है, तो वह दंडात्मक आदेश निरस्त कराने हेतु विधि सम्मत उपाय अपना सकता है।
FIR के अगले दिन हुई थी बर्खास्तगी
यह याचिका शासकीय प्राथमिक विद्यालय, अर्रोली, विकासखंड मुरार, ग्वालियर में सहायक शिक्षक के पद पर पदस्थ मुंसी लाल महोरे ने दाखिल करके 23 अक्टूबर 2022 को सेवा से बर्खास्त किये जाने के आदेश को चुनौती दी थी। यह कार्रवाई जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा M.P. Civil Services (Classification, Control & Appeal) Rules, 1966 के नियम 10(ix) के अंतर्गत की गई थी। याचिकाकर्ता के विरुद्ध 22 अक्टूबर 2022 को थाना बेहट, जिला ग्वालियर में धारा 354 आईपीसी तथा Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012 की धाराओं 7 एवं 8 के अंतर्गत अपराध पंजीबद्ध किया गया था। एफआईआर दर्ज होने के अगले ही दिन सेवा से बर्खास्तगी का आदेश पारित कर दिया गया। 8 अप्रैल 2024 को उसे दोषी पाते हुए सजा सुनाई गई थी। याचिकाकर्ता का दावा था की अविभावकों ने राजनीतिक दुर्भावना के चलते झूठा फंसाया गया है। ऐसे में केवल एफआईआर दर्ज होने के आधार पर, बिना विभागीय जांच एवं सुनवाई का अवसर दिए, उन्हें सेवा से नहीं हटाया जा सकता था। याचिकाकर्ता ने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन बताया था।
दखल का कोई कारण नहीं बनता
अदालत ने अपने फैसले में कहा- याचिकाकर्ता, एक शिक्षक होने के नाते, उच्च स्तर के नैतिक मूल्यों का पालन करने के लिए बाध्य था। यद्यपि बर्खास्तगी का आदेश सेवा नियमों में निर्धारित प्रक्रिया के उल्लंघन में पारित किया गया पाया गया, किंतु आरोपों की गंभीरता को देखते हुए इस स्तर पर दंडादेश में हस्तक्षेप करने का कोई ठोस आधार नहीं बनता। उक्त परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए न्यायालय ने 23 अक्टूबर 2022 के बर्खास्तगी आदेश को बरकरार रखा और याचिका निरस्त कर दी।
हाईकोर्ट का आदेश देखें WP-25361-2022
.png)